भू-आकृति विज्ञान एवम् पर्यावरण भू-विज्ञान


लक्ष्य

भू-आकृति विज्ञान एवम् पर्यावरण भू-विज्ञान विभाग हिमालय के स्थलाकृतिक लक्षणों के अध्ययन तथा भू-गतिक प्रक्रियाओं,जलवायु परिवर्तन एवं प्राकृतिक आपदा के संयोग से हिमालय के  स्थलाकृतिक लक्षणों के  क्रमिक विकास में अध्ययनरत् है । यह विभाग हिमनद गतिकी और पर्यावरण एवम् समाज पर इसके प्रभाव के अध्ययन सहित जल संसाधनों के आकलन में भी अध्ययनरत् है ।

 

हिमालय के सन्दर्भ में भू- आकृति विज्ञान एवम् पर्यावरण भू-विभाग

हिमालय पर्वत श्रृंखला विभिन्न प्रकार के शैलों एवम् उनकी संरचनात्मक विविधता, विभिन्न स्थलाकृतियों, प्राकृतिक संसाधनों और असंख्य पारिस्थितिक तंत्रों का प्रतीक है तथा जिसने बहुतायत मानव समुदाय को रहन-सहन के लिए अपनी और आकर्षित किया है | वास्तव में एशिया महाद्वीप की इस पर्वतश्रृंखला को, इसके क्रमिक भू-गतिक विकास को प्रभावित करने वाली अंतर्जनित एवम् बहिर्जनित प्रक्रियाओं के अध्ययन हेतु प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में देखा जा सकता है | चतुर्थकालिक (Quaternary) विवर्तनिकी और जलवायु परिवर्तन के सम्बन्ध को समझने के लिए चतुर्थकालिक स्थलाकृति एवम् तलछटो(अवसादों) का अध्ययन किया जा रहा है | प्रत्येक सक्रिय भ्रंश खण्डों की गतिविधियों, भ्रंश दर और प्राचीन बडे पूराभूकम्पों के इतिहास का पुननिर्माण एवम् उनकी पुनरावृति काल को समझने के लिए हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में विवर्तनिक स्थलाकृतियाँ को समझना एवम् उनका मानचित्रण प्रमुख रूप से महत्वपूर्ण है |

 

हिमालय के प्राकृतिक संसाधनो में हिम, बर्फ, झीलें, नदियाँ ओर भूमिगत जल, जल के समृद्ध स्रेात है। जल स्रोतो का आकलन करते समय, जल धाराओं के जल प्रवाह में कमी , झीलों एवम् हिमनदों के सिकुडने के अतिरिक्त, हिमालय के मौलिक जल स्रोतो में प्रदूषण मुख्य चिंता के कारण है। जलवायु परिवर्तन से हिमनदो पर आशंकित परिणामों और उसके फलस्वरुप नदी एवम् जल धाराओं के प्रवाह की गतिकी में परिवर्तन और समाज पर इन परिवर्तनों के प्रभाव ने विभाग को हिमनदों एवम् जल संसाधनों के अध्ययन के लिये नवीन पहल हेतु प्रेरित किया है। इनमे से एक नवीन पहल, विज्ञान एवम् प्रौधौगिकी विभाग, भारत सरकार के आदेश से वा0 हि0 भू0 संस्थान में वर्ष 2008 मे हिमनद केन्द्र की स्थापना है। इस हिमनद केन्द्र को हिमनद गतिकी की प्रकृति और जलवायु परिवर्तन अध्ययन नामक दो समस्याओं के अध्धयन पर केन्द्रित होने की जिम्मेदारी दी गयी है।

 

हिमालय में कई तरह की प्राकृतिक आपदाऐं आती है जिनमे केवल बार-बार होने वाले  भू-स्खलन से ही, जन जीवन का भारी नुकसान होता है । विभाग भू-स्खलन के सभी पहलुओं पर अध्ययनरत् है,जिससे कि उन प्रक्रियाओं को समझा जा सके जो भू-स्खलन आरम्भ करती है।  विभाग भू-स्खलन आपदा अनुक्षेत्र मानचित्रीकरण (Landslide hazard zonation mapping) में भी संलग्न है । इस प्रकार के मानचित्रीकरण से न केवल संभाव्य भू-स्खलन आपदा क्षेत्रो के निर्धारण में सहायता मिलती है बल्कि विभिन्न परिस्थितियों मे ढ़ाल के व्यवहार को माँडल करने में भी सहायता मिलती है जो कि भूस्खलन से होने वाले जन जीवन के नुकसान को रोकने की दिशा मे एक अग्रिम प्रयास है।

 

क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन एवम् भविष्य के जलवायु परिदृश्यों के माँडल बनाने के लिये पुराजलवायु का अध्ययन अति आवश्यक है। जो कि हिमालय मे जलवायु सम्बन्धी आपदा बचाव एवम् नियोजन हेतु अति आवश्यक है पुराजलवायु विश्लेषण, कई डेटाबेसों का अध्ययन है और इसके प्रभाव जलवायु निर्भर मानदण्डों, जैसे भूगर्भीय, जैविक, हिमनदीय एवम् एतिहासिक रिकार्डो, पर संरक्षित रहते है। विभाग विभिन्न भूगर्भीय अभिलेखो की सहायता से चतुर्थकाल के अन्तिम भाग (Late Quaternary) के जलवायु परिदृश्य के पुर्ननिर्माण हेतु कठिन प्रयास कर रहा है। इस विशालकाय पर्वत श्रृँखला द्वारा सहे गये पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने के लिए चतुर्थकालिक जलवायु गुणों (attributes) की सामान्य क्षेत्रीय प्रवृत्ति के अत्तिरिक्त जैव- जलवायु- भौतिक मानदण्डों पर इन पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रभाव का अध्ययन आवश्यक होगा।

 

 
   
 
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