जैवस्तरिकी


लक्ष्य

जैवस्तरिकी विभाग का उद्देश्य हिमालय के शैल अनुक्रमो में पाये जाने वाले जीवाश्मों के अध्ययन से पर्वत निर्माण की क्रमिक घटनाक्रम को कालानुक्रम प्रदान करना और हिमालयन भू- विज्ञान को वैश्विक परिपेक्ष्य प्रदान करना है ।

 

जैवस्तरिकी एवम् हिमालय के अवसादी शैलक्रम

जीवाश्मों के अध्ययन से पुराजीवों के बारे में, उनके क्रमिक विकास के कालानुक्रम और प्राचीन वातावरण के बारे में अमूल्य जानकारी मिलती है । इस प्रकार जीवाश्मों का अध्ययन, क्षेत्रीय एवम् वैश्विक परिपेक्ष्य में पृथ्वी के भू-गर्भीय इतिहास को भलीभांति समझने मे सहायक हैं ।

सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र के टीथियन भाग में, न्यूनतम नियो-प्रोटीरोजोइक(नवप्राकजीव) से ईओसिनकल्प के अविरल अनुक्रमण के समुद्री जीवाश्म, पिछले ६० करोड़ साल से संरक्षित हैं ।इसके विपरीत लघु हिमालयन क्षेत्र इस प्रकार अविरल जीवाश्म अभिलेखों सेवंचित है परन्तु इसमें एडियाकारन, लोअर केम्ब्रियन,लोअर परमियन, लेट क्रिटेशियस, पेलीयोसीन और इओसीन जीवाश्म रिकार्ड की सन्निहित्ता भली भाँति सि़द्ध हो चुकी है।

अत्यधिक विवर्तनिक लघु हिमालय फोल्ड थ्रस्ट क्षेत्र में उचित क्रम में स्तरीय अध्यारोपण के लिये सभी जैवस्तरीय सूचनाओं(आकडों) का संकलन एवम् उनका समन्वयन, जैवस्तरिकी विभाग का एक मुख्य उद्देश्य है। जैवस्तरिकी की मुलभूत सूचनाओं की आवश्यकता न केवल संरचनात्मक जटिलताओं,पुराकृष्ट पुर्ननिर्माण और हिमालय पर्वत निर्माण के विकासक्रम की समस्याओं को समझने के लिए है  बल्कि जीवन के विकास, पुराजीवों के प्रवास पथ और भौगोलिक क्षेत्रों की संम्बद्धता, वैश्विक स्तर पर समझने के लिए जैवस्तरिक आंकड़ो का संग्रहण नितान्त आवश्यक है।

संक्षेप में, अवसादी अनुक्रमों के जीवाश्म, घाटीगत, क्षैत्रीय एवम् वैश्विक विकास के कारण भू- भौतिकीय मापदण्डों में सँचयी परिवर्तन के अतिसशक्त प्रतिनिधि हैं। इन सम्बन्धों का अध्ययन करकर ही किसी पैकज के भूगर्भीय इतिहास को कालानुक्रम आधार पर समझा जा सकता है। जैवस्तरीकी शोध से प्राप्त ज्ञान(अंतदृष्टि), हिमालयन भू- विज्ञान के क्षेत्र की सीमा से भी आगे,दूरगामी प्रभाव रखता है फिर चाहे वह जैविक विकासक्रम का अध्ययन हो या वैश्विक जलवायु परिदृश्य में परिवर्तन के द्वारा वर्तमान में पुरावनस्पति एवं पुराजन्तुओं के निर्धारण मे हिमालयन विवर्तनिकी की भूमिका।

 

 
   
 
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